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Sustainability Quality Education

बच्चों की शिक्षा, बड़ों की सीख

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बच्चों की शिक्षा, बड़ों की सीख

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Post Highlights

हमारे बचपन में और हमारे बच्चों के बचपन में बहुत अंतर होता है। हमने जिस समय का बचपन में आंकलन किया था, हमारे बच्चे उससे अलग आवरण में पलते हैं। समय बदलने के साथ सभ्यताओं में, आधुनिकताओं में तथा सीखने के तरीकों में भी थोड़ा बहुत बदलाव रहता है, जिससे हम बच्चों को शिक्षा देते समय बड़ी सरलता से रूबरू हो जाते हैं और स्वयं भी उससे शिक्षा देते हैं। हम अक्सर इस गलतफहमी में रह जाते हैं कि हम बच्चों को सिखा रहे तो भला उनसे हम क्या सीखेंगे। बच्चों की शिक्षा सदैव बड़ों के लिए सीख बनती है। यह तथ्य कई बार सिद्ध भी हुआ है।

अंधेरे कमरे को रोशनी देने के लिए प्रकाश की किरण की आवश्यकता होती है, जब यह किरण उस छोटे कमरे में प्रवेश करती है तो वह धीरे-धीरे प्रत्येक कोने में उजाला कर देती है। यह छोटी सी किरण कब पूरे कमरे को रोशन कर देती है हम इसका आंकलन नहीं कर पाते हैं, परन्तु इस प्रकाश के बाद हम सब कुछ स्पष्ट रूप से देख पाने में सक्षम होते हैं। हमारी दायीं ओर क्या है, बायीं ओर क्या है तथा हमारे सामने क्या है हम साफ-साफ देख पाने के बाद ही यह निश्चित करते हैं कि हमें किस ओर कदम बढ़ाना है। एक शिशु का मन भी एक खाली कमरे की भांति होता है। जब वह इस दुनिया में आता है तो अपने साथ एक निरसता का आवरण ले कर आता है। उसके पास ना ही ज्ञान का प्रकाश होता है और ना ही अज्ञानता का अंधकार। हम बड़े लोग उसके मन में जब ज्ञान की किरण का प्रवेश कराते हैं, तो वही प्रकाश धीर-धीरे उसके कमरे रूपी जीवन को रोशनी से भर देता है तथा वह यह समझ पाने में सफल होता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। 

इस प्रक्रिया पर जब हम माता-पिता या उस बच्चे के संरक्षक अमल कर रहे होते हैं, तो हम स्वयं ऐसी शिक्षा को ग्रहण करते हैं जो कुछ तर्कों पर हमारी सोच को परिवर्तित करता है। वह शिक्षा हमें नए रूप से विचार करने की प्रेरणा देती है। हम बच्चों को शिक्षा देते हैं और बच्चे हमें शिक्षा देते हैं। वह कहते हैं ना कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और हम बड़े होकर भी बच्चों से बहुत कुछ सीखते हैं। 

हमारे व्यवहार में एक बार परिवर्तन तब होता है, जब हम अपनी समझ को विकसित कर रहे होते हैं तथा दूसरी बार हमारे व्यवहार में परिवर्तन तब आता है जब हम अपने बच्चों की समझ को विकसित कर रहे होते हैं। 

हमारी यह कोशिश रहती है कि हमारे बच्चे अच्छे आचरण को अपनाएं, इसलिए हम उन्हें इस व्यवहार से अवगत कराते हैं। इसके लिए हम ख़ुद भी औरों से सही तरीके से बर्ताव करना शुरू करते हैं, क्योंकि आखिरकार बच्चा बड़ों को देखकर ही प्रतिक्रिया देता है और उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलता है। बच्चों को सिखाने के लिए पहले हम ख़ुद सीखते हैं, उस आचरण को पूर्णतः अपने व्यवहार में लाते हैं और एक समय बाद हम उस व्यवहार के आदि हो जाते हैं।

हमारे बचपन में और हमारे बच्चों के बचपन में बहुत अंतर होता है। हमने जिस समय का बचपन में आंकलन किया था, हमारे बच्चे उससे अलग आवरण में पलते हैं। समय बदलने के साथ सभ्यताओं में, आधुनिकताओं में तथा सीखने के तरीकों में भी थोड़ा बहुत बदलाव रहता है, जिससे हम बच्चों को शिक्षा देते समय बड़ी सरलता से रूबरू हो जाते हैं और स्वयं भी उससे शिक्षा देते हैं। हम अक्सर इस गलतफहमी में रह जाते हैं कि हम बच्चों को सिखा रहे तो भला उनसे हम क्या सीखेंगे। बच्चों की शिक्षा सदैव बड़ों के लिए सीख बनती है। यह तथ्य कई बार सिद्ध भी हुआ है।

अंधेरे कमरे को रोशनी देने के लिए प्रकाश की किरण की आवश्यकता होती है, जब यह किरण उस छोटे कमरे में प्रवेश करती है तो वह धीरे-धीरे प्रत्येक कोने में उजाला कर देती है। यह छोटी सी किरण कब पूरे कमरे को रोशन कर देती है हम इसका आंकलन नहीं कर पाते हैं, परन्तु इस प्रकाश के बाद हम सब कुछ स्पष्ट रूप से देख पाने में सक्षम होते हैं। हमारी दायीं ओर क्या है, बायीं ओर क्या है तथा हमारे सामने क्या है हम साफ-साफ देख पाने के बाद ही यह निश्चित करते हैं कि हमें किस ओर कदम बढ़ाना है। एक शिशु का मन भी एक खाली कमरे की भांति होता है। जब वह इस दुनिया में आता है तो अपने साथ एक निरसता का आवरण ले कर आता है। उसके पास ना ही ज्ञान का प्रकाश होता है और ना ही अज्ञानता का अंधकार। हम बड़े लोग उसके मन में जब ज्ञान की किरण का प्रवेश कराते हैं, तो वही प्रकाश धीर-धीरे उसके कमरे रूपी जीवन को रोशनी से भर देता है तथा वह यह समझ पाने में सफल होता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित। 

इस प्रक्रिया पर जब हम माता-पिता या उस बच्चे के संरक्षक अमल कर रहे होते हैं, तो हम स्वयं ऐसी शिक्षा को ग्रहण करते हैं जो कुछ तर्कों पर हमारी सोच को परिवर्तित करता है। वह शिक्षा हमें नए रूप से विचार करने की प्रेरणा देती है। हम बच्चों को शिक्षा देते हैं और बच्चे हमें शिक्षा देते हैं। वह कहते हैं ना कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और हम बड़े होकर भी बच्चों से बहुत कुछ सीखते हैं। 

हमारे व्यवहार में एक बार परिवर्तन तब होता है, जब हम अपनी समझ को विकसित कर रहे होते हैं तथा दूसरी बार हमारे व्यवहार में परिवर्तन तब आता है जब हम अपने बच्चों की समझ को विकसित कर रहे होते हैं। 

हमारी यह कोशिश रहती है कि हमारे बच्चे अच्छे आचरण को अपनाएं, इसलिए हम उन्हें इस व्यवहार से अवगत कराते हैं। इसके लिए हम ख़ुद भी औरों से सही तरीके से बर्ताव करना शुरू करते हैं, क्योंकि आखिरकार बच्चा बड़ों को देखकर ही प्रतिक्रिया देता है और उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलता है। बच्चों को सिखाने के लिए पहले हम ख़ुद सीखते हैं, उस आचरण को पूर्णतः अपने व्यवहार में लाते हैं और एक समय बाद हम उस व्यवहार के आदि हो जाते हैं।

हमारे बचपन में और हमारे बच्चों के बचपन में बहुत अंतर होता है। हमने जिस समय का बचपन में आंकलन किया था, हमारे बच्चे उससे अलग आवरण में पलते हैं। समय बदलने के साथ सभ्यताओं में, आधुनिकताओं में तथा सीखने के तरीकों में भी थोड़ा बहुत बदलाव रहता है, जिससे हम बच्चों को शिक्षा देते समय बड़ी सरलता से रूबरू हो जाते हैं और स्वयं भी उससे शिक्षा देते हैं। हम अक्सर इस गलतफहमी में रह जाते हैं कि हम बच्चों को सिखा रहे तो भला उनसे हम क्या सीखेंगे। बच्चों की शिक्षा सदैव बड़ों के लिए सीख बनती है। यह तथ्य कई बार सिद्ध भी हुआ है।