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Success Motivation

महिला शिक्षा की दाई साबित्रीबाई 

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महिला शिक्षा की दाई साबित्रीबाई 

Post Highlights

ये बात उस दौर की है, जब पुरुषों को भी पढ़ने-लिखने में कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। उस समय कोई महिला ही महिलाओं के हित की बात करे ये तो वही बात हो गयी कि किसी ने सूखे पत्तों को जीवन देने की बात कह दी हो। एक समय ऐसा भी रहा है कि जब पूरी दुनिया तरक़्क़ी के परवाज़ को छू रही थी, उस समय हमारे देश में महिला शिक्षा की बात करना व्यर्थ की बात करने जैसा ही था। जब पूरा देश गुलामी की जंजीर में पड़ा सो रहा था तब साबित्री बाई फुले ने महिला शिक्षा पर जोर देने का कार्य किया।

इस पूरी दुनिया में समय-समय time by time  पर हज़ारो महान हस्तियों famous personality ने जन्म लिया और आज भी ये सिलसिला निरंतर चलता ही आ रहा है। किसी ने सच ही कहा है कि  जब तक यह दुनिया है, तब तक महान इंसानों का जन्म होता ही रहेगा। हम हर दिन अपने आस-पास इस समाज को बनता और बिगड़ता देखते ही रहते हैं, क्योंकि प्रत्येक दिन लोगों का अच्छा और बुरा बर्ताव हमारे आस-पास के वातावरण को बदलता ही रहता है। अगर हम बात करें उन सभ्यताओं civilizations की जिन्होनें हमें सदियों तक गुलाम बनाकर रखा और आज भी हम किसी न किसी सभ्यता, किसी न किसी क़ौम के विचारों से बंधे ही हुए हैं। इतनी सारी बंदिशों के बाद भी कुछ लोग ऐसे उभर कर निकलते हैं जैसे दरिया को चीर कर एक मछली समंदर को पा जाती है, साथ ही साथ वह अपने पीछे इतनी संभावनाएं छोड़ कर जाती है कि उसके ही जैसे लोग उससे प्रेरित होकर अपने आप को किसी दलदल से निकाल पाने में सक्षम हो पाते हैं। साबित्री बाई फुले Savitribai Phule भी एक ऐसी शख़्सियत रही हैं। 

ये बात उस दौर की है, जब पुरुषों को भी पढ़ने-लिखने में कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। उस समय कोई महिला ही महिलाओं के हित की बात करे ये तो वही बात हो गयी कि किसी ने सूखे पत्तों को जीवन देने की बात कह दी हो। एक समय ऐसा भी रहा है कि जब पूरी दुनिया तरक़्क़ी के परवाज़ को छू रही थी, फिर चाहे आप अमरीका America की बात करें या रूस Russia की। उस समय में हमारे देश में महिला शिक्षा women education की बात करना व्यर्थ की बात करने जैसा ही था। जब पूरा देश गुलामी की जंजीर में पड़ा सो रहा था तब साबित्री बाई फुले ने महिला शिक्षा पर जोर देने का कार्य किया। इतने बड़े काम के चलते आज पूरी दुनिया उन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका social reformer एवं मराठी कवियत्री Marathi poetess के नाम से जानती है। 

परिचय और संघर्ष Introduction and Conflict

साबित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ, यूँ समझिये की एक महिला समाज सुधारक के रूप में नए वर्ष में कोई सुगन्धित पुष्प खिला हो। ये भारतीयों के लिए आज भी एक आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत मानी जाती हैं। फिर तो पीछे इन्होनें 1852 में बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना school establishment की। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले Jyotiba Phule से हुआ था, जिन्होंने इन्हें पढ़ाया लिखाया और शिक्षित बनाया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शादी के पश्चात तक इनको पढ़ना-लिखना नहीं आता था। विवाह के बाद ज्योतिबा फुले ने इनको स्वयं ही पढ़ाया, उसके बाद तो ये भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक founder रहीं। इनका सबसे बड़ा रोल या किरदार दलित समाज dalit society की महिलाओं को पढ़ाने और उनको उनके हक़ दिलाने के रूप में देखा जाता है। 

जिस दौर में वे समाज सुधारक के रूप में कार्य कर रहीं थीं आप सभी जानते हैं कि वह कैसा समय था, अंग्रेजों की गुलामी और दलित के नाम का ठप्पा पूरा हिन्दुस्तान झेल रहा था। इतनी सारी विषमताओं के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी, आज पूरा देश उनको एक महानायिका social leader के रूप में देखता है मगर यही समाज पहले उन पर पत्थर मारता था, जब वे स्कूल जाती थीं या उनके विद्यालय जाने का विरोध करता था। हर महान हस्ती के विरोधी कहाँ नहीं होते; सच तो ये है कठिन परिस्थितियों में जीने वाला ही महान बनता है। आप जान के हैरान होंगे कि लोग उन पर गंदगी भी फेंक देते थे। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं, तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर तक फेंका करते थे। इसलिए सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। उनकी यह धारणा से अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से दी उन्होंने। आज से 171 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप  माना जाता था तब ऐसा होता था। उन्होंने फिर भी ऊंच-नीच की खायी पाटने का काम करते हुए हर धर्म, हर जात और हर बिरादरी की महिलाओं के लिए काम किया।

किस तरह की विद्यालय स्थापना और उनका निधन 

ये बात उन दिनों की है जब उनके पति ने कहा कि महिलाओं का उत्थान upliftment of women करने के लिए हमें एक विद्यालय की स्थापना की आवश्यकता होगी। तब उन्होंने 3 जनवरी 1848 पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार the then government ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल a female principal के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया। 

वैसे तो आज उनके जन्मदिन के उपलक्ष में उनकी मर्त्यु की बात की जाये, ये थोड़ा बेबुनियाद सा लगता है। मगर जीवन की असल नियति यही है कि मर्त्यु एक मार्मिक सत्य है और सत्य पर पर्दा नहीं रखा जा सकता। आपको बता दें कि इस  महान नायिका साबित्रीबाई फुले जी का देहांत 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण हो गया था।

इस पूरी दुनिया में समय-समय time by time  पर हज़ारो महान हस्तियों famous personality ने जन्म लिया और आज भी ये सिलसिला निरंतर चलता ही आ रहा है। किसी ने सच ही कहा है कि  जब तक यह दुनिया है, तब तक महान इंसानों का जन्म होता ही रहेगा। हम हर दिन अपने आस-पास इस समाज को बनता और बिगड़ता देखते ही रहते हैं, क्योंकि प्रत्येक दिन लोगों का अच्छा और बुरा बर्ताव हमारे आस-पास के वातावरण को बदलता ही रहता है। अगर हम बात करें उन सभ्यताओं civilizations की जिन्होनें हमें सदियों तक गुलाम बनाकर रखा और आज भी हम किसी न किसी सभ्यता, किसी न किसी क़ौम के विचारों से बंधे ही हुए हैं। इतनी सारी बंदिशों के बाद भी कुछ लोग ऐसे उभर कर निकलते हैं जैसे दरिया को चीर कर एक मछली समंदर को पा जाती है, साथ ही साथ वह अपने पीछे इतनी संभावनाएं छोड़ कर जाती है कि उसके ही जैसे लोग उससे प्रेरित होकर अपने आप को किसी दलदल से निकाल पाने में सक्षम हो पाते हैं। साबित्री बाई फुले Savitribai Phule भी एक ऐसी शख़्सियत रही हैं। 

ये बात उस दौर की है, जब पुरुषों को भी पढ़ने-लिखने में कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। उस समय कोई महिला ही महिलाओं के हित की बात करे ये तो वही बात हो गयी कि किसी ने सूखे पत्तों को जीवन देने की बात कह दी हो। एक समय ऐसा भी रहा है कि जब पूरी दुनिया तरक़्क़ी के परवाज़ को छू रही थी, फिर चाहे आप अमरीका America की बात करें या रूस Russia की। उस समय में हमारे देश में महिला शिक्षा women education की बात करना व्यर्थ की बात करने जैसा ही था। जब पूरा देश गुलामी की जंजीर में पड़ा सो रहा था तब साबित्री बाई फुले ने महिला शिक्षा पर जोर देने का कार्य किया। इतने बड़े काम के चलते आज पूरी दुनिया उन्हें भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका social reformer एवं मराठी कवियत्री Marathi poetess के नाम से जानती है। 

परिचय और संघर्ष Introduction and Conflict

साबित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ, यूँ समझिये की एक महिला समाज सुधारक के रूप में नए वर्ष में कोई सुगन्धित पुष्प खिला हो। ये भारतीयों के लिए आज भी एक आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत मानी जाती हैं। फिर तो पीछे इन्होनें 1852 में बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना school establishment की। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले Jyotiba Phule से हुआ था, जिन्होंने इन्हें पढ़ाया लिखाया और शिक्षित बनाया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शादी के पश्चात तक इनको पढ़ना-लिखना नहीं आता था। विवाह के बाद ज्योतिबा फुले ने इनको स्वयं ही पढ़ाया, उसके बाद तो ये भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक founder रहीं। इनका सबसे बड़ा रोल या किरदार दलित समाज dalit society की महिलाओं को पढ़ाने और उनको उनके हक़ दिलाने के रूप में देखा जाता है। 

जिस दौर में वे समाज सुधारक के रूप में कार्य कर रहीं थीं आप सभी जानते हैं कि वह कैसा समय था, अंग्रेजों की गुलामी और दलित के नाम का ठप्पा पूरा हिन्दुस्तान झेल रहा था। इतनी सारी विषमताओं के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी, आज पूरा देश उनको एक महानायिका social leader के रूप में देखता है मगर यही समाज पहले उन पर पत्थर मारता था, जब वे स्कूल जाती थीं या उनके विद्यालय जाने का विरोध करता था। हर महान हस्ती के विरोधी कहाँ नहीं होते; सच तो ये है कठिन परिस्थितियों में जीने वाला ही महान बनता है। आप जान के हैरान होंगे कि लोग उन पर गंदगी भी फेंक देते थे। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं, तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर तक फेंका करते थे। इसलिए सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। उनकी यह धारणा से अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से दी उन्होंने। आज से 171 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप  माना जाता था तब ऐसा होता था। उन्होंने फिर भी ऊंच-नीच की खायी पाटने का काम करते हुए हर धर्म, हर जात और हर बिरादरी की महिलाओं के लिए काम किया।

किस तरह की विद्यालय स्थापना और उनका निधन 

ये बात उन दिनों की है जब उनके पति ने कहा कि महिलाओं का उत्थान upliftment of women करने के लिए हमें एक विद्यालय की स्थापना की आवश्यकता होगी। तब उन्होंने 3 जनवरी 1848 पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। तत्कालीन सरकार the then government ने इन्हे सम्मानित भी किया। एक महिला प्रिंसिपल a female principal के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया। 

वैसे तो आज उनके जन्मदिन के उपलक्ष में उनकी मर्त्यु की बात की जाये, ये थोड़ा बेबुनियाद सा लगता है। मगर जीवन की असल नियति यही है कि मर्त्यु एक मार्मिक सत्य है और सत्य पर पर्दा नहीं रखा जा सकता। आपको बता दें कि इस  महान नायिका साबित्रीबाई फुले जी का देहांत 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण हो गया था।

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