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Sustainability Community Welfare

आवश्यकता खटखटाती है, तृष्णा का दरवाज़ा

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आवश्यकता खटखटाती है, तृष्णा का दरवाज़ा

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Post Highlights

समाज की एक रीति यह भी है कि, वह स्वयं की तुलना  औरों से करता है, वह इस बात का आंकलन करता है कि वह औरों से अधिक सहज जीवन व्यतीत कर रहा है या नहीं। यदि नहीं तो ख़ुद को समाज में उच्च स्थान पर दिखाने का वह प्रयत्न शुरू करता है और यहीं से वह अपने लालच की आधारशिला रखता है, जो कि अनावश्यक होता है।

हमें अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ बुनियादी चीज़ों की ज़रूरत होती है। हम यदि स्वयं के लिए उन सुविधाओं को उपलब्ध ना कराएं तो दुनिया में हमारा रह पाना नामुमकिन है। हम कह सकते हैं कि हम जी नहीं पाएंगे। मनुष्य का जीवन इन्हीं सिद्धांतों पर चलता है। मनुष्य अपने जीवन में जो भी कार्य करता है, केवल अपनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए करता है। वह ज़रूरत मानसिक स्थिति से भी जुड़ी हो सकती हैं और शरीर से भी। इन सब प्रक्रिया में एक जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है, वह यह होती है कि हम स्वयं को मानसिक रूप से संतुष्ट रखना चाहते हैं। इसके लिए हम निरंतर मेहनत करते हैं, हम प्रयत्न करते हैं कि कैसे भी किसी आसान रास्ते को अपनाकर अपनी आवश्यकता को पूरा कर लिया जाय। इस प्रयास में धीरे-धीरे हमारी राह अपना गंतव्य बदलने लगती है। हमारी आवश्यकताएं आकांक्षाओं की चादर ओढ़ने लगती हैं। अब हमें वह चीज़ें भी चाहिए होती हैं, जो हमारी आवश्यकता तथा संतोष से अधिक होती हैं। स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की भावना हमारे भीतर लालच की आधारशिला रख देती है। हम स्वयं को संतुष्ट करने की कोशिश में लग जाते हैं।

मनुष्य इतना समझदार होता है कि वह प्रकृति के नियमों को भी चुनौती देने में सक्षम होता है। वह स्वयं पर भी नियंत्रण रखने का हुनर रखता है तथा औरों पर भी। परन्तु ऐसा उसी परिस्थिति में होता है, जब मनुष्य ख़ुद के मन को नियंत्रित कर पाता है। क्योंकि मनुष्य के संयम की डोर मन से ही बंधी होती है।

वह कहावत तो सुना ही है हमने कि मनुष्य का मन हवा की तीव्रता से भी तेज चलता है। वह एक क्षण में दुनिया के किसी भी कोने में घूम कर आ सकता है। ठीक इसी तरह मन के माध्यम से ही मनुष्य की आवश्यकता लोभ में परिवर्तित हो जाती है। 

पहले हम अपनी आवश्यकताओं तक ही सीमित थे, परन्तु समय बदलने के साथ-साथ यह लालच के जैसे क्रियाशील रहने लगा और आज यह अपनी चरम सीमा पर है। इस लालच के बढ़ने के कई कारण हैं

समय बदलने से हमने आधुनिक दौर में प्रवेश किया है, जिसमें विज्ञान और तकनीकियों ने अहम योगदान दिया। इसने हमारे जीवन में, हमारे शरीर को आरामदायक बनाने का एक बड़ा कार्य किया है। यह मानव का स्वभाव है कि वह अपने शरीर को आराम देना चाहता है। ऐसे में यदि उसके सामने ऐसे उपकरण हों, जो उसके ख्याल को सच कर देंगे, तो भला वह उस उपकरण को अपने जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बनाना चाहेगा। यही हमारे लालच का आधार है, यह हमारी आवश्यकता नहीं, परन्तु स्वयं को आराम देने के कारण हम इस वस्तु का लालच कर रहे हैं। हमारा जीवन इसके बिना भी चल रहा है, फिर हमें यह साधन चाहिए।

समाज की एक रीति यह भी है कि, वह स्वयं की तुलना औरों से करता है, वह इस बात का आंकलन करता है कि वह औरों से अधिक सहज जीवन व्यतीत कर रहा है या नहीं। यदि नहीं तो ख़ुद को समाज में उच्च स्थान पर दिखाने का वह प्रयत्न शुरू करता है और यहीं से वह अपने लालच की आधारशिला रखता है, जो कि अनावश्यक होता है।

हमें अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ बुनियादी चीज़ों की ज़रूरत होती है। हम यदि स्वयं के लिए उन सुविधाओं को उपलब्ध ना कराएं तो दुनिया में हमारा रह पाना नामुमकिन है। हम कह सकते हैं कि हम जी नहीं पाएंगे। मनुष्य का जीवन इन्हीं सिद्धांतों पर चलता है। मनुष्य अपने जीवन में जो भी कार्य करता है, केवल अपनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए करता है। वह ज़रूरत मानसिक स्थिति से भी जुड़ी हो सकती हैं और शरीर से भी। इन सब प्रक्रिया में एक जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है, वह यह होती है कि हम स्वयं को मानसिक रूप से संतुष्ट रखना चाहते हैं। इसके लिए हम निरंतर मेहनत करते हैं, हम प्रयत्न करते हैं कि कैसे भी किसी आसान रास्ते को अपनाकर अपनी आवश्यकता को पूरा कर लिया जाय। इस प्रयास में धीरे-धीरे हमारी राह अपना गंतव्य बदलने लगती है। हमारी आवश्यकताएं आकांक्षाओं की चादर ओढ़ने लगती हैं। अब हमें वह चीज़ें भी चाहिए होती हैं, जो हमारी आवश्यकता तथा संतोष से अधिक होती हैं। स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की भावना हमारे भीतर लालच की आधारशिला रख देती है। हम स्वयं को संतुष्ट करने की कोशिश में लग जाते हैं।

मनुष्य इतना समझदार होता है कि वह प्रकृति के नियमों को भी चुनौती देने में सक्षम होता है। वह स्वयं पर भी नियंत्रण रखने का हुनर रखता है तथा औरों पर भी। परन्तु ऐसा उसी परिस्थिति में होता है, जब मनुष्य ख़ुद के मन को नियंत्रित कर पाता है। क्योंकि मनुष्य के संयम की डोर मन से ही बंधी होती है।

वह कहावत तो सुना ही है हमने कि मनुष्य का मन हवा की तीव्रता से भी तेज चलता है। वह एक क्षण में दुनिया के किसी भी कोने में घूम कर आ सकता है। ठीक इसी तरह मन के माध्यम से ही मनुष्य की आवश्यकता लोभ में परिवर्तित हो जाती है। 

पहले हम अपनी आवश्यकताओं तक ही सीमित थे, परन्तु समय बदलने के साथ-साथ यह लालच के जैसे क्रियाशील रहने लगा और आज यह अपनी चरम सीमा पर है। इस लालच के बढ़ने के कई कारण हैं

समय बदलने से हमने आधुनिक दौर में प्रवेश किया है, जिसमें विज्ञान और तकनीकियों ने अहम योगदान दिया। इसने हमारे जीवन में, हमारे शरीर को आरामदायक बनाने का एक बड़ा कार्य किया है। यह मानव का स्वभाव है कि वह अपने शरीर को आराम देना चाहता है। ऐसे में यदि उसके सामने ऐसे उपकरण हों, जो उसके ख्याल को सच कर देंगे, तो भला वह उस उपकरण को अपने जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बनाना चाहेगा। यही हमारे लालच का आधार है, यह हमारी आवश्यकता नहीं, परन्तु स्वयं को आराम देने के कारण हम इस वस्तु का लालच कर रहे हैं। हमारा जीवन इसके बिना भी चल रहा है, फिर हमें यह साधन चाहिए।

समाज की एक रीति यह भी है कि, वह स्वयं की तुलना औरों से करता है, वह इस बात का आंकलन करता है कि वह औरों से अधिक सहज जीवन व्यतीत कर रहा है या नहीं। यदि नहीं तो ख़ुद को समाज में उच्च स्थान पर दिखाने का वह प्रयत्न शुरू करता है और यहीं से वह अपने लालच की आधारशिला रखता है, जो कि अनावश्यक होता है।