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Synergy Mindset

जीवनभर सीखते रहना, स्वयं को प्रोत्साहित करना

Synergy Mindset

जीवनभर सीखते रहना, स्वयं को प्रोत्साहित करना

Post Highlights

मनुष्य को जीवन भर सीखते रहना चाहिए तथा‌ इसके लिए स्वयं को प्रोत्साहित करना चाहिए। सदैव सीखते रहने से मनुष्य के मानसिक स्तर प्रभाव पड़ता है तथा वह डिप्रेशन में नहीं जाता है। सीखते रहने के लिए मनुष्य प्रयास करता है जिसका असर शारीरिक क्रिया पर भी पड़ता है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जीवनभर सीखते रहना, स्वयं को प्रोत्साहित करते रहना अति आवश्यक है ।

मनुष्य स्वभाव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह बदलता रहता है। यदि परिवर्तनशील ना रहे तो शायद वह मनुष्य के स्वभाव की श्रेणी में ही ना आए। हम कह सकते हैं कि सिर्फ मनुष्य का स्वभाव ही नहीं परिवर्तनशील है बल्कि दुनिया की हर एक चीज परिवर्तनशील है और यही प्रकृति का नियम है। परिवर्तन होता रहना समाज के नियमों को निर्धारित करता है, उसी प्रकार से चीजों में बदलाव होने के साथ-साथ सीखने की क्षमता भी परिवर्तित होती है। परिवर्तन के साथ मनुष्य में आशाओं तथा जिज्ञासा का जन्म होता है, जहां से वह नए पहलूओं को अनुभव करना शुरू करता है तथा बहुत कुछ सीखता है। शायद मानव के भीतर जन्म लेती रही जिज्ञासा ही उसे निरंतर कुछ न कुछ नया सीखते रहने के लिए प्रेरित करता है। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य के अन्दर यह जिज्ञासा पैदा हो आवश्यक नहीं। साथ ही उसके अंदर ये जिज्ञासा हमेशा बानी रहे ये यह भी आवश्यक नहीं। इसी कारण से एक समय बाद कुछ न कुछ सीखते रहने की लालसा भी ख़त्म हो जाती है। तो क्या स्वयं को उत्साहित करना ज़रूरी नहीं ताकि हम निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहें।

हम सबने यह मशहूर लाइन तो सुनी ही है कि, सीखने की कोई उम्र नहीं होती है। यह कथन सत्य भी है, क्योंकि जब मनुष्य के भीतर सीखने की जिज्ञासा पैदा होती है तभी वह कोई चीज़ सीख पाता है और हम इस बात को नकार नहीं सकते कि मानव के मन में जिज्ञासा के जन्म लेने की कोई निश्चित आयु नहीं होती है। कोई भी ज्ञान कभी हानिकारक नहीं होता है, तो क्या स्वयं को कुछ सीखते रहने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक नहीं? क्या यह प्रोत्साहन हमारे दिमाग को ज्ञान के परिपेक्ष में सागर की गहराइयों जितना प्रौढ़ नहीं बनाएगा। क्या हम इससे अपना तथा अपने आस-पास के वातावरण के लिए कुछ हितकारी नहीं करेंगे?

हमें सदैव कुछ सीखने के लिए प्रेरित  Motivated  रहना चाहिए तथा यह केवल अपने साथ नहीं, हमारे अगल-बगल जो भी लोग हैं उन्हें भी इसके लिए उत्साहित करना चाहिए। मन के भीतर जन्मी जिज्ञासा से हम कुछ नया कार्य करने के लिए उत्साहित होते हैं और कठिन परिस्थितियों difficult situations में भी अपने आत्मविश्वास को बनाए रखते हैं। यह तथ्य हमारे व्यवसाय के परिपेक्ष में लाभकारी होता है। यह हमारे हर एक कार्य को फ़ायदा पहुंचाता है। व्यवसाय में समय-समय पर  सकारात्मक बदलाव positive change करना आवश्यक है, इससे कर्माचारी ज़्यादा मन लगाकर कार्य करते हैं क्योंकि उन्हें कुछ नया सीखने की जिज्ञासा होती है तथा ग्राहक भी व्यवसाय से लगातार जुड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें भी कुछ नया मिलने की जिज्ञासा होती है। मनुष्य को जीवन भर सीखते रहना चाहिए तथा‌ इसके लिए स्वयं को प्रोत्साहित करना चाहिए। सदैव सीखते रहने से मनुष्य के मानसिक स्तर प्रभाव पड़ता है तथा वह डिप्रेशन में नहीं जाता है। सीखते रहने के लिए मनुष्य प्रयास करता है जिसका असर शारीरिक क्रिया पर भी पड़ता है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जीवनभर सीखते रहना, स्वयं को प्रोत्साहित करते रहना अति आवश्यक है ।

मनुष्य स्वभाव की यह प्रवृत्ति होती है कि वह बदलता रहता है। यदि परिवर्तनशील ना रहे तो शायद वह मनुष्य के स्वभाव की श्रेणी में ही ना आए। हम कह सकते हैं कि सिर्फ मनुष्य का स्वभाव ही नहीं परिवर्तनशील है बल्कि दुनिया की हर एक चीज परिवर्तनशील है और यही प्रकृति का नियम है। परिवर्तन होता रहना समाज के नियमों को निर्धारित करता है, उसी प्रकार से चीजों में बदलाव होने के साथ-साथ सीखने की क्षमता भी परिवर्तित होती है। परिवर्तन के साथ मनुष्य में आशाओं तथा जिज्ञासा का जन्म होता है, जहां से वह नए पहलूओं को अनुभव करना शुरू करता है तथा बहुत कुछ सीखता है। शायद मानव के भीतर जन्म लेती रही जिज्ञासा ही उसे निरंतर कुछ न कुछ नया सीखते रहने के लिए प्रेरित करता है। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य के अन्दर यह जिज्ञासा पैदा हो आवश्यक नहीं। साथ ही उसके अंदर ये जिज्ञासा हमेशा बानी रहे ये यह भी आवश्यक नहीं। इसी कारण से एक समय बाद कुछ न कुछ सीखते रहने की लालसा भी ख़त्म हो जाती है। तो क्या स्वयं को उत्साहित करना ज़रूरी नहीं ताकि हम निरंतर कुछ न कुछ सीखते रहें।

हम सबने यह मशहूर लाइन तो सुनी ही है कि, सीखने की कोई उम्र नहीं होती है। यह कथन सत्य भी है, क्योंकि जब मनुष्य के भीतर सीखने की जिज्ञासा पैदा होती है तभी वह कोई चीज़ सीख पाता है और हम इस बात को नकार नहीं सकते कि मानव के मन में जिज्ञासा के जन्म लेने की कोई निश्चित आयु नहीं होती है। कोई भी ज्ञान कभी हानिकारक नहीं होता है, तो क्या स्वयं को कुछ सीखते रहने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक नहीं? क्या यह प्रोत्साहन हमारे दिमाग को ज्ञान के परिपेक्ष में सागर की गहराइयों जितना प्रौढ़ नहीं बनाएगा। क्या हम इससे अपना तथा अपने आस-पास के वातावरण के लिए कुछ हितकारी नहीं करेंगे?

हमें सदैव कुछ सीखने के लिए प्रेरित  Motivated  रहना चाहिए तथा यह केवल अपने साथ नहीं, हमारे अगल-बगल जो भी लोग हैं उन्हें भी इसके लिए उत्साहित करना चाहिए। मन के भीतर जन्मी जिज्ञासा से हम कुछ नया कार्य करने के लिए उत्साहित होते हैं और कठिन परिस्थितियों difficult situations में भी अपने आत्मविश्वास को बनाए रखते हैं। यह तथ्य हमारे व्यवसाय के परिपेक्ष में लाभकारी होता है। यह हमारे हर एक कार्य को फ़ायदा पहुंचाता है। व्यवसाय में समय-समय पर  सकारात्मक बदलाव positive change करना आवश्यक है, इससे कर्माचारी ज़्यादा मन लगाकर कार्य करते हैं क्योंकि उन्हें कुछ नया सीखने की जिज्ञासा होती है तथा ग्राहक भी व्यवसाय से लगातार जुड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें भी कुछ नया मिलने की जिज्ञासा होती है। मनुष्य को जीवन भर सीखते रहना चाहिए तथा‌ इसके लिए स्वयं को प्रोत्साहित करना चाहिए। सदैव सीखते रहने से मनुष्य के मानसिक स्तर प्रभाव पड़ता है तथा वह डिप्रेशन में नहीं जाता है। सीखते रहने के लिए मनुष्य प्रयास करता है जिसका असर शारीरिक क्रिया पर भी पड़ता है। इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जीवनभर सीखते रहना, स्वयं को प्रोत्साहित करते रहना अति आवश्यक है ।

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