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Sustainability Justice For All

विजय का तिलक विजय दिवस

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विजय का तिलक विजय दिवस

Post Highlights

कभी जो जगह पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जानी जाती थी और पाकिस्तानी सेना की गुलाम बनती जा रही थी, उस ज़मीन के हक़ उनके ही लोगों को दिला कर भारतीय सेना ने शौर्य की गाथा लिखते हुए विजय का परचम लहराया। इस ऐतिहासिक जीत की याद में ही आज पूरा भारत विजय दिवस मनाता है,जिसकी तारीख़ है 16 दिसंबर। आइये हम भी इसको थोड़ा करीब से जानते हैं।

युद्ध war सदियों से चलते आ रहे हैं और इस बात को कहने में कोई हिचकिचाहट hesitation नहीं होनी चाहिए कि युद्ध मनुष्य जाति के रहते चलते ही रहेंगे। जिस तरह एक किसान अपने खेत अपनी ज़मीन को माँ के रूप देखता है, ठीक उसी तरह एक जवान a miltry man अपने देश की ज़मीं को माँ का दर्ज़ा देते हुए उसकी रक्षा हेतु अपनी आहुति देने के लिए एक पल भी हिचकता नहीं, घबराता नहीं। असल बात यही है, अपने देश की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध शौर्य का प्रतीक होता है। व्यर्थ का युद्ध छेड़ने वाले लोगों को भारतीय सेना, "ईंट का जवाब शान्ति से भी देना जानती है और न मानने पर पत्थरों से भी देना जानती है। कुल मिला कर भारतीय सेना हर परिस्थिति में दुश्मनों से लड़ने के लिए परिपक्व mature है। आज सारा देश उज्ज्वलित bright होकर विजय दिवस मना रहा है। इस युद्ध के पचास साल पुरे होने के बावजूद भी यह एक अदुभुत आकर्षण से भरा दिन जान पड़ता है। आइये हम भी इसको थोड़ा करीब से जानते हैं। 

विजय का तिलक विजय की गाथा सुनाता है, ये दिवस 1971 का गीत सुनाता है। ये बात है उस समय की, जब युद्ध की पृष्‍ठभूमि the background of war साल 1971 की शुरुआत से ही बनने लगी थी। भारत के पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान pakistan के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां dictator yahiya khan ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को अपनी ही सेना की ताकत से कुचलने का फ़रमान जारी किया। इसके बाद शेख़ मुजीब sheikh mujeeb को गिरफ़्तार कर लिया (युद्ध विराम के बाद बांग्लादेश के पितामह और वहां के राष्ट्रपति बने)। तब वहां से कई शरणार्थी Refugees लगातार भारत आने लगे। इस बात ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी। 

देखते ही देखते तब भारत के अखबारों में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें आने लगीं, तब भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि आखिर भारत अपनी सेना के द्वारा पूर्वी पाकिस्तान east pakistan की जनभावनाओं के संरक्षण हेतु हस्तक्षेप क्यों नहीं करता। एक पड़ोसी मुल्क होने के नाते पूर्वी पाकिस्तान में बिगड़ते हालात ने भारत की नींद उचाट दी। तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी Prime Minister Indira Gandhi जी ने अपना मन बनाते हुए अप्रैल में आक्रमण करने के लिए अपने रक्षा विशेषज्ञों का रुझान माँगा। हाई लेवल मीटिंग high level meeting में इस बारे में इंदिरा गांधी ने थल सेनाध्‍यक्ष जनरल मानेकशॉ Chief of Army Staff General Manekshaw की राय ली। बाद उसके मानेकशॉ ने सियासी दबाव में झुके बिना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से स्पष्ट कह दिया कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं।

सारी तैयारियों के चलते युद्ध शुरू करने से पहले ही पाकिस्तान ने हमेशा की तरह अपनी करतूत दिखा दी और पीठ-पीछे वार करने की आदत को दोहराना शुरू कर दिया। हालांकि भारतीय सेना अपनी तैयारियों में मग्न थी और उधर 3 दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता kolkata में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। ठीक उसी दिन शाम के वक्‍त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करते हुए पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। फिर तो न चाहते हुए भी युद्ध का आगाज़ जल्द करना पड़ा।

युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने पूर्व में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए जेसोर और खुलना आदि स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया। भारतीय सेना की रणनीति थी कि अहम ठिकानों को छोड़ते हुए किसी भी तरह सबसे पहले आगे बढ़ा जाए। युद्ध में मानेकशॉ जी ने खुलना और चटगांव पर ही कब्ज़ा करने पर ज़ोर देना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे भारतीय सेना ने युद्ध में पकड़ बना ली। अंततः अरोड़ा arora अपने दलबल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द समाप्त होने वाला था। बाद में जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म-समर्पण surrender का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था। शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। अरोडा़ और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म-समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए। 

इंदिरा गांधी ने लोकसभा में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की कि भारतीय सेना के अध्भुत पराक्रम और वीरता के चलते युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्‍न में डूब गया।

एक ऐसा युद्ध जिसने पड़ोसी मुल्क को हरा देने के बाद भी उसका सम्मान किया और उनकी ही सेना के अत्याचारों से उनको निजात दिलवाई। साथ ही साथ एक नए देश का उदय हुआ जिसका नाम बांग्लादेश Bangladesh है। बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति first president of Bangladesh ने भारत तथा भारतीय सेना का तहे दिल से इस्तकबाल किया। कभी जो जगह पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जानी जाती थी और पाकिस्तानी सेना की गुलाम बनती जा रही थी उस ज़मीन के हक़ उनके ही लोगों को दिला कर भारतीय सेना ने शौर्य की गाथा लिखते हुए विजय का परचम लहराया। इस ऐतिहासिक जीत की याद में ही आज पूरा भारत विजय दिवस मनाता है, जिसकी तारीख़ है 16 दिसंबर।

युद्ध war सदियों से चलते आ रहे हैं और इस बात को कहने में कोई हिचकिचाहट hesitation नहीं होनी चाहिए कि युद्ध मनुष्य जाति के रहते चलते ही रहेंगे। जिस तरह एक किसान अपने खेत अपनी ज़मीन को माँ के रूप देखता है, ठीक उसी तरह एक जवान a miltry man अपने देश की ज़मीं को माँ का दर्ज़ा देते हुए उसकी रक्षा हेतु अपनी आहुति देने के लिए एक पल भी हिचकता नहीं, घबराता नहीं। असल बात यही है, अपने देश की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध शौर्य का प्रतीक होता है। व्यर्थ का युद्ध छेड़ने वाले लोगों को भारतीय सेना, "ईंट का जवाब शान्ति से भी देना जानती है और न मानने पर पत्थरों से भी देना जानती है। कुल मिला कर भारतीय सेना हर परिस्थिति में दुश्मनों से लड़ने के लिए परिपक्व mature है। आज सारा देश उज्ज्वलित bright होकर विजय दिवस मना रहा है। इस युद्ध के पचास साल पुरे होने के बावजूद भी यह एक अदुभुत आकर्षण से भरा दिन जान पड़ता है। आइये हम भी इसको थोड़ा करीब से जानते हैं। 

विजय का तिलक विजय की गाथा सुनाता है, ये दिवस 1971 का गीत सुनाता है। ये बात है उस समय की, जब युद्ध की पृष्‍ठभूमि the background of war साल 1971 की शुरुआत से ही बनने लगी थी। भारत के पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान pakistan के सैनिक तानाशाह याहिया ख़ां dictator yahiya khan ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को अपनी ही सेना की ताकत से कुचलने का फ़रमान जारी किया। इसके बाद शेख़ मुजीब sheikh mujeeb को गिरफ़्तार कर लिया (युद्ध विराम के बाद बांग्लादेश के पितामह और वहां के राष्ट्रपति बने)। तब वहां से कई शरणार्थी Refugees लगातार भारत आने लगे। इस बात ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी। 

देखते ही देखते तब भारत के अखबारों में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें आने लगीं, तब भारत पर यह दबाव पड़ने लगा कि आखिर भारत अपनी सेना के द्वारा पूर्वी पाकिस्तान east pakistan की जनभावनाओं के संरक्षण हेतु हस्तक्षेप क्यों नहीं करता। एक पड़ोसी मुल्क होने के नाते पूर्वी पाकिस्तान में बिगड़ते हालात ने भारत की नींद उचाट दी। तब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी Prime Minister Indira Gandhi जी ने अपना मन बनाते हुए अप्रैल में आक्रमण करने के लिए अपने रक्षा विशेषज्ञों का रुझान माँगा। हाई लेवल मीटिंग high level meeting में इस बारे में इंदिरा गांधी ने थल सेनाध्‍यक्ष जनरल मानेकशॉ Chief of Army Staff General Manekshaw की राय ली। बाद उसके मानेकशॉ ने सियासी दबाव में झुके बिना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से स्पष्ट कह दिया कि वे पूरी तैयारी के साथ ही युद्ध के मैदान में उतरना चाहते हैं।

सारी तैयारियों के चलते युद्ध शुरू करने से पहले ही पाकिस्तान ने हमेशा की तरह अपनी करतूत दिखा दी और पीठ-पीछे वार करने की आदत को दोहराना शुरू कर दिया। हालांकि भारतीय सेना अपनी तैयारियों में मग्न थी और उधर 3 दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता kolkata में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। ठीक उसी दिन शाम के वक्‍त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार करते हुए पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। फिर तो न चाहते हुए भी युद्ध का आगाज़ जल्द करना पड़ा।

युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने पूर्व में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए जेसोर और खुलना आदि स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया। भारतीय सेना की रणनीति थी कि अहम ठिकानों को छोड़ते हुए किसी भी तरह सबसे पहले आगे बढ़ा जाए। युद्ध में मानेकशॉ जी ने खुलना और चटगांव पर ही कब्ज़ा करने पर ज़ोर देना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे भारतीय सेना ने युद्ध में पकड़ बना ली। अंततः अरोड़ा arora अपने दलबल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे और युद्ध विराम भी जल्द समाप्त होने वाला था। बाद में जैकब जब नियाज़ी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्म-समर्पण surrender का दस्तावेज़ मेज़ पर रखा हुआ था। शाम के साढ़े चार बजे जनरल अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। अरोडा़ और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म-समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए। 

इंदिरा गांधी ने लोकसभा में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की कि भारतीय सेना के अध्भुत पराक्रम और वीरता के चलते युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्‍न में डूब गया।

एक ऐसा युद्ध जिसने पड़ोसी मुल्क को हरा देने के बाद भी उसका सम्मान किया और उनकी ही सेना के अत्याचारों से उनको निजात दिलवाई। साथ ही साथ एक नए देश का उदय हुआ जिसका नाम बांग्लादेश Bangladesh है। बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति first president of Bangladesh ने भारत तथा भारतीय सेना का तहे दिल से इस्तकबाल किया। कभी जो जगह पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जानी जाती थी और पाकिस्तानी सेना की गुलाम बनती जा रही थी उस ज़मीन के हक़ उनके ही लोगों को दिला कर भारतीय सेना ने शौर्य की गाथा लिखते हुए विजय का परचम लहराया। इस ऐतिहासिक जीत की याद में ही आज पूरा भारत विजय दिवस मनाता है, जिसकी तारीख़ है 16 दिसंबर।